द्वारका नगरी का इतिहास – History of Dwarka town

द्वारका नगरी का इतिहास – History of Dwarka town
नमस्कार मित्रों ,
श्री कृष्ण जी की नगरी द्वारका – Dwarka नगरी का इतिहास – History भारत के सबसे पुराने शहरों में से हैं। द्वारका नगरी भारत के पश्चिम गुजरात में समुद्र के किनारे पर बसी है । द्वारका गुजरात के देवभूमि द्वारका जिले में स्थित एक नगर है। यह हिन्दुओं के सर्वाधिक पवित्र स्थानों में से एक है। द्वारका चार धामों में तथा सात पुरियो में से एक है।
महाभारत, भागवत पुराण, स्कंद पुराण और विष्णु पुराण में द्वारका का उल्लेख है। यह प्राचीन काल में कुशस्थली के नाम से जाना जाता था। द्वारका को द्वारावती, आनर्तक, ओखा-मंडल, गोमती द्वारका, चक्रतीर्थ, अंतरद्वीप, वारिदुर्ग, उदधिमध्यस्थान के नाम से भी जानते है। अभी वर्तमान समय में दो द्वारका हैं, एक गोमती द्वारका है, दसूरी बेट द्वारका है। गोमती द्वारका धाम है, जो कि देवभूमि द्वारका में स्थित है , जबकि बेट द्वारका पुरी है, जो की कच्छ की खाड़ी में समुद्र के बीच एक टापू पर स्थित है।
द्वारका का निर्माण इतिहास – History of Dwarka
पौराणिक कथाओं के अनुसार द्वारका नगरी का निर्माण का कारण जरासंध का श्री कृष्ण जी के राज्य पर बार – बार आक्रमण बताया गया है।कथा के अनुसार जब श्री कृष्ण जी कंस का वध कर देते है, तब कंस के ससुर ने प्रतिशोध लेने की ठानी, और 17 बार कृष्ण जी पर आक्रमण किया । परन्तु जरासंध हर बार हार गया। कृष्ण जी युद्ध से जीतकर भी दुखी थे । क्योंकि जब भी युद्ध होता दोनों पक्षों के कई सैनिक मारे जाते, बहुत नरसंहार होता। कृष्ण जी आगे युद्ध नहीं चाहते थे। और भविष्य में जन हानि ना हो इसके लिए उन्होंने अपने राज्य से निकल कर अपने 18 साथियों को लेकर सौराष्ट्र चले आए, और एक नया राज्य स्थापित किया। जिसकी राजधानी द्वारका थी। पौराणिक कथाओं के अनुसार द्वारका को प्राचीन काल में कुशस्थली के नाम से जाना जाता था। महाराज रैवतक ने यह कुश बिछकर यज्ञ किया था, तभी से इस स्थान का नाम कुशस्थली पड़ा था। श्री कृष्ण जी राज्य बसाने इसी कुशस्थली आए परन्तु तब यह उजाड़ व खंडर थी, तब श्री कृष्ण जी ने द्वारका की स्थापना के लिए समुद्र से और भूमि ली, तथा विश्वकर्मा जी द्वारा इस नगरी का निर्माण किया गया। कृष्ण जी ने 36 वर्षों तक यहां सफतापूर्वक राज्य किया।
द्वारका समुद्र में कैसे विलीन हुई – How Dwarka merged into the sea

पौराणिक कथाओं के अनुसार द्वारका के पतन व समुद्र में विलीन होने के प्रमुख दो कारण बताए है। जिनमे एक माता गांधारी द्वारा श्री कृष्ण जी को यदुवंश कि समाप्ति का श्राप। और दूसरा ऋषियों द्वारा श्री कृष्ण जी के पुत्र सांब दिया गया श्राप है । यदुवशियों की समाप्ति और द्वारका के पतन के आखिर में श्री कृष्ण जी ने अर्जुन को संदेश पहुंचाया की द्वारका डूबने वाली है, तो वे आकर बचे हुए सभी द्वारका के निवासियों को ले जाए। कृष्ण जी की मृत्यु के पश्चात जैसे ही अर्जुन नगरवासियों को लेकर द्वारका से निकलते है । ठीक उसके कुछ समय पश्चात ही द्वारका जलमग्न हो जाती है।
द्वारका की खोज और शोध – Dwarka’s discovery and research
कहा जाता है कि कृष्ण की मृत्यु के साथ उनकी बसाई हुई यह नगरी समुद्र में डूब गई। आज भी यहां उस नगरी के अवशेष मौजूद हैं।दुनिया भर के इतिहासकारों का मानना था कि ई.सा. पुर्व भारत मे कभी कोई बड़ा नगर नही था। परंतु द्वारका नगर कि खोज ने सभी इतिहासकारों को सोचने पर मजबूर कर दिया। कार्बन डेटिंग के अनुसार खुदाई मे मिली द्वारका नगरी का इतिहास 9000 वर्ष पुराना है। समुद्र मे खोज के दौरान प्राप्त ये नगर 60 कि.मी. के क्षेत्रफल मे फैला था। G.S.I. के नेतृत्व मे समुद्र मे एक रिसर्च सर्वे करने का फैसला लिया गया। इस रिसर्च के दौरान ही खम्बात कि खाड़ी मे ली गई रडार स्केन इमेज से पानी मे डूबी हुई द्वारका नगरी कि पहली झलक दुनिया के सामने आई। समुद्र के अंदर इस जगह का पता नेशनल इंस्टीट्यूट आँफ ओसन टेक्नोलॉजी ने लगाया। जिस समय वे समुद्र मे प्रदुषण कि स्थिति का पता लगा रहे थे, उसी दौरान उन्हें पता लगा कि समुद्र मे इस स्थान पर बडे ही व्यवस्थित तरीके से बनी ज्यामिती आकृतियाँ उपस्थित है। समुद्र कि गहराई मे 30 मीटर अंदर ये स्थान किनारे से 20 कि.मी. दुर है, जो पानी के नीचे बहुत बडे क्षेत्रफल मे फैला है। इस जगह मे पानी के नीचे पूरा का पूरा शहर बसा है, इसमे घर, जलाशय, गलीया, पानी कि नालीया उपस्थित है। इस स्थान के अध्ययन से ज्ञात हुआ कि यह सभ्यता मोहन जोदडो कि सभ्यता से भी कई अधिक प्राचीन है। 19 मई 2001 को मानव संसाधन मंत्री रह चुके मुरली मनोहर जोशी जी ने एक घोषणा कि जिसके के अंतरगत उन्होंने बताया कि एक प्राचीन सभ्यता के नष्ट होने के प्रमाण गुजरात के समुद्र तट के पास खंबात कि खाड़ी मे पाए गए है। जिसे भगवान श्री कृष्ण के द्वारा बसाई पौराणिक नगरी द्वारका नगरी माना गया। 1919 से 2001 के बीच हुए सर्वे मे ली गई सोनार तस्वीरों से पता चला की समुद्र के नीचे स्क्वेयर और रेट एंगल के आकार कि कई आकृतियाँ प्राप्त हुई है जो कि बहुत ही व्यवस्थित ढंग से वहाँ उपस्थित थी। इसका समुद्र मे पाया जाना वैज्ञानिकों कि उम्मीद से बाहर था। खोज आगे बड़ी तो पता चला कि खंबात की खाड़ी मे 20 मीटर कि गहराई मे इसके और भी कई राज छुपे है। खोज पुरी होने पर उन्हें वहाँ से और भी कई अवशेष प्राप्त हुए जिनमें एक लकड़ी का टुकड़ा, मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े, पत्थरों के औजार, हड्डियां, दांत आदि थे। इसके पश्चात इन अवशेषों को देश विदेश भेजा गया जहाँ इनकी कार्बन डेटिंग से पता चला कि प्राप्त अवशेषों मे कुछ अवशेष 9 हजार से 10 हजार वर्ष पुराने है। यहां पर हमारी भारतीय नौसेना ने भी सहयोग किया, और नौसेना कि मदद से 40 हजार वर्ग मीटर के क्षेत्रफल मे खुदाई कि गई। खुदाई मे भवनों के विशालकाय खण्ड प्राप्त हुए। पुरातत्व विशेषज्ञों ने बताया कि प्राप्त खण्ड विशाल भवनों तथा मंदिरों के अवशेष है।
द्वारका मे समुद्र के भीतर ही नही बल्कि जमीन पर भी खुदाई की गई। धरातल पर 10 मीटर तक किये गए इस उत्खनन मे सिक्के तथा कई कलाकृतियां प्राप्त हुई।टीम ने पानी कि गहराई मे जाकर जलमग्न नगर कि तस्वीरें ली, और विस्तृत अध्ययन किया। इसके पश्चात ही द्वारका को उसका गौरव प्राप्त हो सका। और भारतीयों सहित विश्व भर के इतिहासकारों ने इसे मानव इतिहास कि एक अनूठी और भव्य खोज माना। भारत कि ये खोज प्रमाणित करती है कि दुनिया मे सबसे पहले विकसित होने वाली सभ्यताओं मे भारत सदैव सर्वप्रथम रहा है।इतनी खोजों के पश्चात अभी भी द्वारका के कई रहस्य सामने आना शेष है। वैज्ञानिक स्कूबा डायविंग के जरिए समुद्र की गहराइयों में कैद इस रहस्य को सुलझाने में लगे हैं। समुद्र में लहरों कि गति और समुद्र के पानी में हलचल के कारण खोज करने में कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। पर हमारे वैज्ञानिक नई तकनीक की मदद से खोज करने में कार्यरत है। और उम्मीद है भविष्य में हमें द्वारका नगरी से जुड़े और भी कई जानकारियां जानने को मिले।
इतनी खोजों के पश्चात अभी भी द्वारका के कई रहस्य सामने आना शेष है। वैज्ञानिक स्कूबा डायविंग के जरिए समुद्र की गहराइयों में कैद इस रहस्य को सुलझाने में लगे हैं। समुद्र में लहरों कि गति और समुद्र के पानी में हलचल के कारण खोज करने में कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। पर हमारे वैज्ञानिक नई तकनीक की मदद से खोज करने में कार्यरत है। और उम्मीद है भविष्य में हमें द्वारका नगरी से जुड़े और भी कई जानकारियां जानने को मिले।