राजस्थान के कुलधरा गाँव का इतिहास – History of Kuldhara village of Rajasthan

नमस्कार मित्रों ।
“राजस्थान का कुलधरा गाँव”Kuldhara village of Rajasthan
कुलधरा गाँव , यह गाँव राजस्थान राज्य के जैसलमेर जिले के पश्चिम मे लगभग 18 से 25 कि.मी. कि अनुमानित दूरी पर स्थित है। यह गाँव एक एतिहासिक और पर्यटक स्थान है। परंतु इससे जुड़े भयानक तथा शापित होने कि बातों कि वजह से सुरक्षा को ध्यान मे रखते हुए पर्यटकों को सुर्योदय से सुर्यास्त के मध्य ही आवागमन कि अनुमानित है।
माना जाता है कि यह गाँव शापित है, यदि किसी ने भी यहां रहने का प्रयास किया तो उसकी मृत्यु हो जाती है। शायद इसी कारण यह गाँव 191 वर्षो से पुर्ण रूप से विरान हि पड़ा है।
आइए इसके विषय मे विस्तार से जानते है। जैसलमेर से क़रीब 18 से 25 किलोमीटर की दूरी पर पश्चिम मे “कुलधरा गाँव” है। ऐसी मान्यता है कि पालीवाल ब्राह्मणों ने कुलधरा और जैसलमेर के चारों और 120 किलोमीटर इलाक़े में फैले 83 अन्य गांवों को लगभग 500 सालों तक आबाद किया था, इतिहास के अनुसार, इस गाँव में लगभग 500 वर्षों के लिए पालीवाल ब्राह्मण बसे थे।पालीवाल ब्राह्मणों के पूर्वजों का संबंध भगवान श्रीकृष्ण जी की पत्नी रुक्मिणी जी से जुड़ा हुआ है। माना जाता है कि पालीवाल ब्रह्मण इनके पुरोहित हुआ करते थे। परंतु जिस समय कि यह घटना है उस समय यह पालीवाल किसान हुआ करते थे। यह कृषि के अलावा भवन निर्माण कला में निपुण थे। राज्य के दूसरे गाँवों से यह गाँव खुशहाल और संपन्न हुआ करता था। इन लोगों को वास्तु का बहुत अच्छा ज्ञान था, यह लोग वास्तु मे प्रवीण थे। इस बात का प्रमाण इनके निवास निर्माण कि कला से स्पष्ट होता है। कहते हैं कि इस गाँव के घरों में दरवाजे या किसी भी प्रकार की सुरक्षा व्यवस्था नहीं थी। “कुलधरा गाँव” को इस प्रकार बनाया गया था कि गाँव का मुख्य प्रवेश द्वार और गाँव के घरों के बीच बहुत लंबा फ़ासला हुआ करता था।
लेकिन गाँव के निर्माण के वक़्त ऐसी ध्वनि प्रणाली का उपयोग किया गया था कि गाँव के मुख्य प्रवेश द्वार से ही क़दमों की आवाज़ गाँव में घरों तक पहुंच जाती थी। इसलिए यहां के लोगों को कभी भी चोरी और डकैती का खतरा नहीं रहता था। अगर इस गाँव के आसपास रह रहे लोगों की मानें तो उस समय कुलधरा के ये घर झरोखों और मोखरों के ज़रिए आपस में जुड़े थे और घरों के भीतर पानी के कुंडों और सीढ़ियों का बड़ी ही कुशलता के साथ निर्माण किया गया था। यहां के स्थानीय निवासियों के अनुसार इस गाँव के घर ऐसे बने थे कि बहने वाली हवाएं सीधे घर के भीतर से होकर गुज़रती थीं और रेगिस्तान में होने के बाद भी ये घर बहुत ठंडे होते थे।
इस गाँव के शापित होने तथा लोगों का एक ही रात मे अचानक गायब होने के पिछे एक बहुचर्चित किस्सा है। पालीवालों के 5,000 परिवारों ने उस समय के जैसलमेर रियासत के दीवान सालिम सिंह के अत्याचारों से परेशान होकर गाँव छोड़ा।
सालिम सिंह ने दो जैसलमेर राजाओं मूलराज और गज सिंह के समय दीवान के तौर पर काम किया. सालिम सिंह ने पालीवालों के करों और लगान में इतनी बढ़ोतरी कर दी कि उनका व्यापार और खेती करना मुश्किल हो गया।
ब्रिटिश राज्य के राजस्थान में राजनीतिक नुमाइंदे जेम्स टॉड ने पालीवालों के कुलधरा छोड़ने के बारे में लिखा है।
कर्नल जेम्स टॉड ने अपनी किताब ‘ऐनल्स एंड एंटिक्विटीज़ ऑफ़ राजस्थान’ में लिखा है कि सालिम सिंह के अत्याचारों की वजह से ‘यह पैसे वाला समाज लगभग स्व निर्वासन में है और बैंकर्स अपनी मेहनत के मुनाफे के साथ घर लौटने को डरते हैं’।
टॉड ब्रिटिश साम्राज्य से चाहते थे वो सालिम सिंह के कुशासन की वजह से जैसलमेर रियासत से अपनी संधि तोड़े। सन् 1818 की संधि सुनिश्चित करती थी कि ब्रिटिश सेना जैसलमेर को बाहरी आक्रमणों से सुरक्षित रखेगी। टॉड यह भी लिखते हैं कि ‘सालिम सिंह ने साजिश के तहत पालीवालों की सम्पत्ति को कम किया’।
वो कहते हैं कि गज सिंह के पहले दो साल के शासन (1820-21) में ही 14 लाख रुपये की सम्पत्ति अर्जित की गई।
पालीवाल ब्राह्मण उस समय की सिंध रियासत (अब पाकिस्तान में) और दूसरे देशों से पुराने सिल्क रूट से अनाज, अफीम, नील, हाथी दांत के बने आभूषण और सूखे मेवों का ऊँटों के कारवां पर व्यापार करते थे. इसके अलावा वे कुशल किसान और पशुपालक थे।
जैसलमेर पर दो पुस्तकें लिखने वाले स्थानीय इतिहासकार नन्द किशोर शर्मा कहते हैं, ‘पालीवाल, सालिम सिंह के अत्याचारों से दुखी थे लेकिन अपने गाँवों को छोड़ने का फैसला उन्होंने तब किया जब सालिम सिंह ने उनकी एक लड़की पर बुरी नज़र डाली। सालिम सिंह की पहले से सात बीवियां थीं।’
नन्द किशोर शर्मा जैसलमेर में दो सांस्कृतिक संग्रहालय चलाते है ।
उन्होंने अपनी किताब ‘जैसलमेर, दि गोल्डेन सिटी’ में लिखा है कि सालिम सिंह ने लड़की सौंपने के लिए पालीवालों को एक दिन का समय दिया जिस पर बहुत गुस्सा थे. उन्होंने काठोरी गाँव में पंचायत की और जैसलमेर छोड़ने का फैसला किया।
राजस्थान पुरातत्व विभाग के दस्तावेज़ भी शर्मा जी के कथन की पुष्टि करते हुए प्रतीत होते हैं, “कालचक्र का एक और प्रतिकूल दौर आया और ब्राह्मण समाज को तत्कालीन जैसलमेर रियासत से मजबूर होकर अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए सन 1825 में सभी आबाद गांवों को एक ही दिन में छोड़ना पड़ा।
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